पृष्ठ

यह ब्लॉग खोजें

गुरुवार, 18 अगस्त 2011

झरोखा

मन है और उसको ओढ़े हुए एक देह
कुछ है जो नहीं है

जीवन है
धरती हरी चुनर ओढ़े खड़ी है
और
विस्तृत मरुप्रांतर की शुष्क हवा
के ऊपर खिला है आकाश.


समुद्र है कहीं दूर उस न देखे झरोखे-सा
नदी की
छूटी हुई  धारा की पहुँच से बाहर
आँखों के काजल में डूबती दिशाएं
कुछ चिटक-सा जाता है हर बार.


आह भगवान! तुम हो
क्या यहीं कहीं बादलों में इन्द्रधनुष के रंगों-से
ओ मायावी!  


5 टिप्‍पणियां: