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शनिवार, 23 सितंबर 2017

बारिशें

छोटी-छोटी बूँदों की उतावली
लड़ियाँ जब दिनों
बरसती रहें
जैसे आसमान के दिल में
कोई बात सुराख कर गयी हो
खुद झर-झर नष्टनीड़
हो हर सूखेपन के खिलाफ
बरस पड़ती बारिशों को देखना
क्यों देखना भर ही नहीं हो सकता बस
ये बेवजह की परेशानियां कितनी बावजह है
क्यों बताऊं
एक चिड़िया जो भोर से
ही नाराज पड़ी है इनसे
चीं-चीं कर पूरी खिड़की पर नाकामयाब
उड़ान की खराशें रख गयी है
उसकी झुंझलायी आँखों की जर्दी पर
प्यार आया है बेवजह!
कंक्रीट की दीवार पर
चलती डिब्बे की तरतीब
अविकल रही इन बेमकसद बातों से
उसे इन चिड़ियों, इन टहनियों और
बरसातों से क्या!
जिंदगी की सरपट दौड़ में ठुनकते
इन दिनों से क्या!
-सुधा.

सोमवार, 28 अगस्त 2017

नदी का भी एक रंग होता है

नदी खोई-सी थी
लहर...पानी...फूल...
सबसे अलग
पत्थर की सीढ़ियों से सिर टकराती
हर बार.
दूर कहीं वो जहाज जा रहा था
जहाँ डूबता है सूरज
चुपचाप हर रोज.
सुनो नदी गा रही है
वही गीत जो होठों से फिसल पड़ा था अभी पानी में.

पानी का भी एक रंग होता है.

    -सुधा.

बुधवार, 13 नवंबर 2013

माँ बरसाती नदी है

माँ बरसाती नदी है
रिमझिम बूँदों की सुंदरता न हो
पर जीवन को भरे-पूरे रूप में समो लेने
की शक्ति है वह
हर आने वाली बारिश में
भर जाती है पूरी-की-पूरी
और बीतते मौसम के साथ
जब उतर जाता है समूचा पानी
उसकी सोंधी आँखों में कौंध जाता है
किसी बिखरते हुए बादल का वह दृश्य
जो उसकी मिट्टी की तहों के नीचे कहीं दूर बसा है ।

हर बार की टोक जो झंुझला जाती है मन को
पर जानती हूँ मैं
वह जीना चाहती है मुझमें भरपूर, एक-एक पल में
मरना चाहती है मेरे साथ
क्योंकि बरसाती नदी है वह
और जानती है कि हर बीतता समय
उसे ख़ाली नहीं करता
तभी तो घोर एकाकीपन में भी
वह बचाये रखती है पानी की स्मृति को
अपनी देह पर ।

- सुधा🌺




सोमवार, 23 सितंबर 2013

नदी

एक नदी थी
कुछ काई की रंगत वाली
पहाड़ों के चादर में लिपटी हुई
उसके शांत स्थिर पानी में
दिखती थीं कई-कई विस्मृतियां
हाँ, जब धूप उसके पैरों के कोने से फिसलकर
चादर के पीछे सो रहती है।

सतह के नीचे फैले शैवालों से
झाँकती हैं किलकारियाँ
और रात घिरने पर ढेर के ढेर उगे अंगूरों
पर आवारा बच्चों की मचलती टोलियाँ
सैलानियों की रंगीन टोपियाँ
जो प्रेमी जोडों की आतुर फुसफुसाहट में उलझ चुकी हैं
और वह सब जो इसके ज़िंदा होने के गवाह थे,
कहीं खो गये हैं शायद।

कहते हैं पूर्णमासी की भरी रात में आज भी
गा उठती है नदी
और पहाड़ों के बीच पानी बहता रहता है.




--- सुधा.

बुधवार, 18 अप्रैल 2012

शहर

सोया हुआ शहर 
आँखों में 
उतरा आये ख्वाब की तरह होता है.

कुछ रातरानी के फूल 
अनगिन दीयों की टिमटिमाती महक में
घुल गए हों जैसे
हल्की सरसराहटों में
बीता हुआ वक़्त आकाश
के झीने चादर को
गहराता चला जाता है

और चांदी की नदी
सपनीली घाटियों में आते-आते ठिठक पड़ती है
                                                                                                                                                       -सुधा 



शुक्रवार, 6 अप्रैल 2012

स्मित

जब तुम अपनी तोतली आवाज़ में
शब्दों के घरौंदें बुनती हो
मेरे आकाश की डाली पर
एक गुलमोहर खिलता है

अपनी नन्हीं उँगलियों के स्पर्श से
तुम मन की किसी अदृश्य वीणा
पर छेड़ देती हो
कोई सुहाना राग.

वसंत के पूर्वागमन-सी 
स्वप्न में मुकुलित तुम्हारी आँखें
मरुभूमि के उपवन तो नहीं!
क्या कहूँ इन्हें!!

फिर जाने क्यूँ यह जग
तुम्हारे आगमन पर
नहीं गुनगुनाता खुशी के गीत.
तुम्हारे शब्दों को घेर लेता है अपने
दायरे में
और
तुम
इस आँगन में सारी सीमाओं को झुठलाते हुए
भींगे होठों के पीछे से
अपनी धवल मुस्कान
बिखरा जाती हो
आह! मेरी स्मित..








शनिवार, 3 मार्च 2012

सफ़ेद पंख

जब कभी तुम अपने सफ़ेद पंखों में
मुझे
लपेट लेती हो
तुम्हारे सादेपन की रंगत
मेरा कुछ ले उड़ती है.
घने गांछों के सिर पर
जहाँ सांझ उगती है
और डूब जाता है
अनमना-सा सूरज
कुछ भी तो नहीं बदलता
फिर जाने क्यों टहनियां झुक जाती हैं
उदास होकर
और
जरा सा रूककर तुम  मुझे छोड़ देती हो 
वहीँ कहीं अनजाने में ही