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शुक्रवार, 9 दिसंबर 2011

...और मैं एंटरटेनमेंट हूं

सिल्क, एक ऐसी लड़की की कहानी है जो अस्सी की दशक में पैदा तो हुई लेकिन वह अपने समय से काफी आगे की सोच रखती है. व्यक्ति स्वातंत्रय की उस आदिम भावना को अपने जिस्म के लिफाफे में लपेटे वह लड़की अपने रास्ते खुद चुनती है और सोचती है कि वह अपनी मंजिल भी चुनेगी,ये उसका नितांत निजी चयन होगा. लेकिन पितृसत्तात्मक समाज के ढांचें में उसकी यह बोल्डनेस उसके खिलाफ एक ऐसा हथियार बन जाती है जिससे वह पूरी तरह निचोड़ ली जाती है, और जब तक उसे इस सच्चाई का अहसास होता है वह पूरी तरह टूट चुकी होती है. एक ऐसा समाज जहाँ औरत को देह से अधिक कुछ समझा नहीं जाता वहाँ  ऐसी स्त्री इस त्रासद अंत के लिए अभिशप्त है...द डर्टी पिक्चर वही रियल्टी बयां करती है.


हमने औरत को अपने सुविधा के अनुसार परिभाषित करने की आदत डाल ली है, औरत माँ है, बहन है, प्रेमिका है, बाजार में रखी मनोरंजन की वस्तु है...वह सब कुछ है, बस नहीं है तो औरत!  इन stereotype रूपों  में सिल्क की शख्सियत नहीं बंधती, उसे देखने के लिए जरूरी है कि हम अपने आंखों से रंगीन चश्मों को उतार फेंके.


'फिल्में तीन चीजों से चलती हैं- एंटरटेनमेंट,एंटरटेनमेंट,एंटरटेनमेंट और मैं एंटरटेनमेंट हूं'' कहने वाली औरत को इंडस्ट्री के मर्दों ने  यह कहकर खारिज  कर दिया कि उसके पास जो था वह दिखा चुकी. 

गुरुवार, 18 अगस्त 2011

झरोखा

मन है और उसको ओढ़े हुए एक देह
कुछ है जो नहीं है

जीवन है
धरती हरी चुनर ओढ़े खड़ी है
और
विस्तृत मरुप्रांतर की शुष्क हवा
के ऊपर खिला है आकाश.


समुद्र है कहीं दूर उस न देखे झरोखे-सा
नदी की
छूटी हुई  धारा की पहुँच से बाहर
आँखों के काजल में डूबती दिशाएं
कुछ चिटक-सा जाता है हर बार.


आह भगवान! तुम हो
क्या यहीं कहीं बादलों में इन्द्रधनुष के रंगों-से
ओ मायावी!  


सोमवार, 8 अगस्त 2011

saara aakash: एक सवाल

saara aakash: एक सवाल: "एक प्रश्न मेरे ज़ेहन में बार-बार उठता है कि जातिवादी व्यवस्था जो हमारे समाज में एक अरसे से चली आ रही है,उसका समाधान क्या हो! आखिर वह कौन सी..."

एक सवाल

एक प्रश्न मेरे ज़ेहन में बार-बार उठता है कि जातिवादी व्यवस्था जो हमारे समाज में एक अरसे से चली  आ रही  है,उसका समाधान क्या हो! आखिर वह कौन सी मानसिकता या कि सामाजिक समझ थी जिसने इस विचार को जन्म दिया होगा कि समाज खांचे में बटा हो.लेकिन इधर कुछ मित्रों की असहिष्णुता देखकर अहसास होता है कि किंचित ऐसे ही कुछ कट्टर मानसिकता के लोग होंगें जिन्होंने स्वयं को अन्यों से श्रेष्ठ मान लिया होगा.मैं बात कर रही हूँ आरक्षण के मुद्दे पर छिड़ी उस गर्म बहस की जिसमें पढ़े लिखे समझदार लोग भी नासमझों की भाषा इस्तेमाल कर रहे हैं और साम्प्रदायिकता के ज़हर का प्रसार कर रहे हैं. क्या आप को नहीं लगता कि इस तरह तो हम एक वर्णव्यवस्था से निकलकर दूसरी में प्रवेश करने की ओर अग्रसर हैं?

saara aakash: जानेवालों से - निदा फाजली

saara aakash: जानेवालों से - निदा फाजली: "जानेवालों से राब्ता* रखना दोस्तों, रस्मे-फातहा रखना जब किसी से कोई गिला रखना सामने अपने आइना रखना घर की तामीर* चाहे जैसी हो इसमें ..."

जानेवालों से - निदा फाजली

जानेवालों से राब्ता* रखना
दोस्तों, रस्मे-फातहा रखना

जब किसी से कोई गिला रखना
सामने अपने आइना रखना

घर की तामीर* चाहे जैसी हो
इसमें रोने की कुछ जगह रखना

जिस्म में फैलने लगा है शहर
अपनी तन्हाईयाँ बचा  रखना

मस्जिदें हैं नमाज़ियों के लिए
अपने दिल में कहीं खुदा रखना

मिलना-जुलना जहाँ ज़रूरी हो
मिलने-जुलने का हौसला रखना

उम्र करने को है पचास को पार
कौन है किस जगह पता रखना



*१. सम्बन्ध
*२. निर्माण




रविवार, 7 अगस्त 2011

aisi hi thi barsaat

कभी शब्द और अर्थ पास होकर भी किसी अनजाने क्षितिज 
की ओर खुलने लगते हैं ...क्या है ये ! 
इस इंद्रजाल की सोंधी सी महक में 
हलके बहुत थोड़े से भींगे पत्तों की छुअन 
डाल से अभी-अभी टपके फूल की लजाई मुस्कान
और रात के अन्धकार में डूबते अंतिम तारे 
की अटूट निष्ठा 
ये सब और बहुत और भी कुछ हमसे लिपटता जाता है...

गुरुवार, 4 अगस्त 2011

saara aakash: कला

saara aakash: कला: "'यह शायद मस्तिष्क का एक ही उचित पक्ष होता है जो एक पुरुष को आभूषणों और कला के अपेक्षाकृत अधिक स्थिर सिद्धांतों से सम्बंधित सत्य या क्या सही ..."

कला

"यह शायद मस्तिष्क का एक ही उचित पक्ष होता है जो एक पुरुष को आभूषणों और कला के अपेक्षाकृत अधिक स्थिर सिद्धांतों से सम्बंधित सत्य या क्या सही है - इसका एक विचार बनाने में सक्षम बनाता है. इसमें पूर्णता का एक ही केंद्र होता है,हालाँकि यह अपेक्षाकृत छोटे वृत्त का केंद्र होता है. वेशभूषा के फैशन द्वारा इसका खुलासा करने के लिए -इसमें अच्छी या बुरी रुचि होती है. एक वेशभूषा के तत्व बड़े से लघु, छोटे से लंबे में निरंतर बदलते रहते हैं; लेकिन उसका आकार आमतौर पर एक सा रहता है,जिसे तुलनात्मक रूप से बहुत हल्के आधार पर तैयार किया जाता है. लेकिन फैशन इसी पर आधारित होता है. एक व्यक्ति जो बहुत सफलतापूर्वक सुरुचिपूर्ण नई वेशभूषा की ईजाद करता है, वह संभवतः उसी कुशलता को इससे बड़े उद्देश्य  में लगाये तो उसी उचित रुचि के आधार पर कला में भी उच्च स्तरीय दक्षता हासिल कर लेगा."


(सर जोशुआ रेनॉल्ड्स के डिस्कोर्स    -स्त्रियों की पराधीनता से साभार.)

मंगलवार, 26 जुलाई 2011

आधुनिक शेखर

  " विद्रोही बनते नहीं, उत्पन्न होते हैं.विद्रोह्बुद्धि परिस्थियों से संघर्ष की सामर्थ्य, जीवन की क्रियाओं से, परिस्थितियों के घात-प्रतिघात से नहीं निर्मित होती. वह आत्मा का कृत्रिम परिवेष्टन नहीं है, उसका अभिन्नतम अंग है. मैं नहीं मानता कि दैव कुछ है, क्योंकि हममें कोई विवशता, कोई बाध्यता है तो वह बाहरी नहीं, भीतरी है. यदि बाहरी होती,परकीय होती, तो हम उसे दैव कह सकते, पर वह तो भीतरी है, हमारी अपनी है, उसके पक्के होने के लिए भले ही बाहरी निमित्त हो.  उसे हम व्यक्तिगत नियति - 'Personal destiny' - कह सकते हैं."
   'शेखर : एक जीवनी' उपन्यास की शुरुआत अज्ञेय 'मैं' शैली में करते हैं परन्तु कथा के प्रवाह के साथ इस 'मैं' का तृतीय पुरुष  में

शुक्रवार, 15 जुलाई 2011

गरज-बरस - निदा फाजली

निदा फाजली की शायरी में  बारिश के बाद धुले आकाश में खिलते इन्द्रधनुष की-सी कशिश है.इनके अंदाज़-ए-बयां में जिंदगी के हर रंग ढलें हैं, आज हम जिस कठिन समय में जी रहें हैं...जहाँ इन्सानियत की दुहाई देना बुझदिली समझी जाती है और दूसरों को चोट पहूँचाने को कला.मुंबई में हूआ  सिरीयल ब्लास्ट तो उस बर्बरता की  एक कड़ी भर है जिसने दुनिया भर में लाखों निर्दोष लोगों की जाने ली है...ऐसे में निदा फाजली की कुछ पंक्तियाँ याद आती हैं जो मैंने बहुत पहले पढ़ीं थी....




गरज-बरस प्यासी धरती पर 
                          फिर पानी दे मौला
चिड़ियों को दाने, बच्चों को
                          गुडधानी दे मौला


दो और दो का जोड़ हमेशा 
                          चार कहाँ होता है
सोच-समझवालों को थोड़ी
                          नादानी दे मौला


फिर रौशन कर ज़हर का प्याला 
                          चमका नयी सलीबें
झूठों की दुनिया में सच को
                          ताबानी* दे मौला 


फिर मूरत से बाहर आकार 
                          चारों ओर बिखर जा
फिर मंदिर को कोई 'मीरा'
                          दीवानी दे मौला


तेरे होते कोई किसी की
                        जान का दुश्मन क्यों हो
जीनेवालों को मरने की
                        आसानी दे मौला



* ताबानी- जगमगाहट 

शुक्रवार, 8 जुलाई 2011

aisi hi thi barsaat





कभी शब्द और अर्थ पास होकर भी किसी अनजाने क्षितिज 
की ओर खुलने लगते हैं ...क्या है ये ! 
इस इंद्रजाल की सोंधी सी महक में 
हलके बहुत थोड़े से भींगे पत्तों की छुअन 
डाल से अभी-अभी टपके फूल की लजाई मुस्कान
और रात के अन्धकार में डूबते अंतिम तारे 
की अटूट निष्ठा 
ये सब और बहुत और भी कुछ हमसे लिपटता जाता है...कैप्शन जोड़ें