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सोमवार, 25 अक्तूबर 2010

सपना

चाँद को देखा मैंने
एक  अधूरा सपना
जिनके रेशे तार-तार होकर
निस्सीमता के आकाश में
बिखरते  जा रहे हैं.

 नदी की धार
सुनहरे गुलाबों की पंक्तियाँ 
निःशब्द धूप-छाहीं की आगोश में 
जैसे रीस रही थीं.  

 



3 टिप्‍पणियां:

  1. आखिर बन ही गयी कविता। अच्छी रचना।

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  2. संध्या जी,

    आज पहली बार आपके ब्लॉग पर आना हुआ.....बहुत सुन्दर ब्लॉग है आपका....इस रचना में आपने कमाल कर दिया है बड़ी खूबसूरती से आपने भावों को शब्दों में पिरोया है...... आप ऐसे ही लिखती रहें.....इस उम्मीद में आपको फॉलो कर रहा हूँ...

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