पृष्ठ

यह ब्लॉग खोजें

शनिवार, 23 सितंबर 2017

बारिशें

छोटी-छोटी बूँदों की उतावली
लड़ियाँ जब दिनों
बरसती रहें
जैसे आसमान के दिल में
कोई बात सुराख कर गयी हो
खुद झर-झर नष्टनीड़
हो हर सूखेपन के खिलाफ
बरस पड़ती बारिशों को देखना
क्यों देखना भर ही नहीं हो सकता बस
ये बेवजह की परेशानियां कितनी बावजह है
क्यों बताऊं
एक चिड़िया जो भोर से
ही नाराज पड़ी है इनसे
चीं-चीं कर पूरी खिड़की पर नाकामयाब
उड़ान की खराशें रख गयी है
उसकी झुंझलायी आँखों की जर्दी पर
प्यार आया है बेवजह!
कंक्रीट की दीवार पर
चलती डिब्बे की तरतीब
अविकल रही इन बेमकसद बातों से
उसे इन चिड़ियों, इन टहनियों और
बरसातों से क्या!
जिंदगी की सरपट दौड़ में ठुनकते
इन दिनों से क्या!
-सुधा.

सोमवार, 28 अगस्त 2017

नदी का भी एक रंग होता है

नदी खोई-सी थी
लहर...पानी...फूल...
सबसे अलग
पत्थर की सीढ़ियों से सिर टकराती
हर बार.
दूर कहीं वो जहाज जा रहा था
जहाँ डूबता है सूरज
चुपचाप हर रोज.
सुनो नदी गा रही है
वही गीत जो होठों से फिसल पड़ा था अभी पानी में.

पानी का भी एक रंग होता है.

    -सुधा.