मन है और उसको ओढ़े हुए एक देह
जीवन, धरती,फूल, शब्द
और
विस्तृत मरुप्रांतर की शुष्क हवा
के ऊपर खिला है आकाश.
समुद्र है कहीं दूर उस न देखे झरोखे-सा
नदी की
छूटी हुई धारा की पहुँच से बाहर
आँखों के काजल में डूबती दिशाएं
कुछ चिटक-सा जाता है हर बार.
आह ईश्वर! तुम हो
क्या यहीं कहीं बादलों में इन्द्रधनुष के रंगों-से