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बुधवार, 27 अक्तूबर 2010

स्त्री

स्त्री पदबंध का जो रूप आज हमारे सामने है,वह पुरूष वर्चस्व की विरासत है. एक स्त्री कैसे सोचती है,किस तरह उसे अभिव्यक्ति देती है या किस तरह का उसका रहन सहन होना चाहिए, इन सब पर भी उसी वर्चस्व का नियंत्रण है.इस तरह एक सांचे में ढली स्त्री हमारे सामने आती है..जीव-विज्ञान की दृष्टी से भले ही वह कुपोषण का शिकार हो,परन्तु उसके कोमल मस्तिष्क में यह बात कहीं गहरे तक जज्ब कर दी गयी है की अगर उसे attention पाना है तो zero figure में ही रहना होगा.

7 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत लम्बे समय तक स्त्री पुरुष के अधीन रहकर अपने दायित्यो का निर्वहन करती रही है, परन्तु अब परिस्तिथिया बदल चुकी है स्त्रिया हर क्षेत्र में अपना जौहर दिखा रही है !और पुरुष से ज्यादा एक स्त्री ही स्त्री के मार्ग में बाधक रही है ऐसे में सिर्फ पुरुष को ही दोष देना कहा तक उचित है..............

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  2. The artist, like the God of the creation, remains within or behind or beyond or above his handiwork, invisible, refined out of existence, indifferent, paring his fingernails...स्त्री पुरूष की वही सृष्टि है,वर्षों के दमन ने स्त्री से उसका स्वस्थ व्यक्तित्व छीनकर एक रूखा,अनमना-सा और चिढा हुआ व्यक्तित्व दिया है.हाँ पर जैसा आपने कहा कि आज स्त्री हर क्षेत्र में अपना जौहर दिखा रही है...यह सच है और इसका एकमात्र कारण उसकी दुर्दमनीय जिजीविषा है...और वे सचमुच बधाई की पात्र हैं जिन्होंने अपनी परिस्थितियों की सीमाओं का अतिक्रमण किया है.पर जरा सोचिये अगर शुरू से आपकी इन साथियों को भरपूर सहयोग,सुरक्षा और पोषण मिला होता तो क्या आपके घर के बगल में जो लड़की रहती है ,वह थोड़ी और सुन्दर,स्वस्थ और बुद्धिमान न होती...!
    बात इल्जाम लगाने की नहीं,जीवन के स्वस्थ और सुन्दर विकास की है...GOOD DAY.

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  3. .

    बहुत कुछ बदल चुका है, लेकिन फिर भी कुछ नहीं बदला है। एक स्त्री को अपने सम्मान की रक्षा स्वयं ही करनी होगी।

    .

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  4. बिटिया
    बधाई बात कहने के लिये
    एक सलाह दूंगा बुरा मत मानना सनसनी खेज मत लिखना लेकिन इतना उष्ण ज़रूर लिखना कि पत्थर भी पिघल कर बह जावे
    माफ़ करना बिटिया सलाह बुरी लगे तो मेल भेज देना
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    एक नज़र : ताज़ा-पोस्ट पर
    मानो या न मानो
    पंकज जी को सुरीली शुभ कामनाएं : अर्चना जी के सहयोग से
    पा.ना. सुब्रमणियन के मल्हार पर प्रकृति प्रेम की झलक
    ______________________________

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  5. हमारे समाज में आज भी लडकियों पर ही सारे संस्कार लाद दिए जाते है . लड़की से संसकारों के पालन की अपेक्षा ज्यादा की जाती है.
    लड़की चाहे कितनी ही ससक्त क्यों न हो पर उस के अन्दर कही गहरे असुरक्षा की भावना है चाहे हो संस्कार या परिस्थिति वश ही क्यों न हो ,यही कारण है की वह आज भी कही न कही पुरुषो पर ही निर्भर है .

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  6. बदलते परिवेश मैं,
    निरंतर ख़त्म होते नैतिक मूल्यों के बीच,
    कोई तो है जो हमें जीवित रखे है,
    जूझने के लिए है,
    उसी प्रकाश पुंज की जीवन ज्योति,
    हमारे ह्रदय मे सदैव दैदीप्यमान होती रहे,
    यही शुभकामनाये!!
    दीप उत्सव की बधाई...................

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  7. वाह....कितनी सादगी से आपने कितनी गहरी बात कह दी...बहुत खूब |

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