पृष्ठ

यह ब्लॉग खोजें

शनिवार, 3 मार्च 2012

सफ़ेद पंख

जब कभी तुम अपने सफ़ेद पंखों में
मुझे
लपेट लेती हो
तुम्हारे सादेपन की रंगत
मेरा कुछ ले उड़ती है.
घने गांछों के सिर पर
जहाँ सांझ उगती है
और डूब जाता है
अनमना-सा सूरज
कुछ भी तो नहीं बदलता
फिर जाने क्यों टहनियां झुक जाती हैं
उदास होकर
और
जरा सा रूककर तुम  मुझे छोड़ देती हो 
वहीँ कहीं अनजाने में ही












शनिवार, 14 जनवरी 2012

ख़्वाब

पहले ख्वाब केवल तीन तरह के होते थे- बच्चों का ख़्वाब, जवानों का ख़्वाब और बूढों का ख़्वाब. फिर ख्वाबों की इस फ़ेहरिस्त में आजादी के ख़्वाब भी शामिल हो गये. और फिर ख्वाबों की दुनिया में बड़ा घपला हुआ. माता-पिता के ख़्वाब बेटे-बेटियों के ख्वाबों से टकराने लगे. पिताजी बेटे को डॉक्टर बनाना चाहते हैं, और बेटा कम्युनिस्ट पार्टी का होल टाइमर बनकर बैठ जाता है. केवल यही घपला नहीं हुआ. बरसाती कीड़ों कि तरह भांति-भांति के ख़्वाब निकल आए. क्लर्कों के ख़्वाब. मजदूरों के ख़्वाब. मिल मालिकों के ख़्वाब. फिल्म स्टार बनने के ख़्वाब. हिंदी ख़्वाब. उर्दू  ख़्वाब. हिन्दुस्तानी ख़्वाब. पाकिस्तानी ख़्वाब. हिंदू ख़्वाब. मुसलमान ख़्वाब. सारा देश ख़्वाबों की दलदल में फँस गया. बच्चों, नौजवानों और बूढों के ख़्वाब ख़्वाबों की धक्कमपेल में तितर-बितर हो गये. हिंदू बच्चों, हिंदू  बूढ़ों और हिंदू नौजवानों के ख़्वाब मुसलमान बच्चों, मुसलमान बूढ़ों और मुसलमान नौजवानों के ख़्वाबों से अलग हो गये. ख़्वाब बंगाली, पंजाबी और उत्तर प्रदेशी हो गए. 
राजनीति वालों ने केवल यह देखा कि एक दिन हिंदुस्तान से एक टुकड़ा अलग हो गया और उसका नाम पकिस्तान पड़ गया. यदि केवल इतना ही हुआ होता तो घबराने कि कोई बात न होती. परन्तु ख़्वाब उलझ गये और साहित्यकार के हाथ-पाँव काट गये. ख़्वाब देखना व्यक्ति, देश और उम्रों का काम है. परन्तु हमारे देश में आजकल व्यक्ति ख़्वाब नहीं देखता. जागते-जागते देश की आंखें दुखने लगती हैं- रही उम्रें - तो वे ख़्वाब देखना भूल गई हैं.
आखिर कोई किस बूते पर ख़्वाब देखे!
परन्तु क्राइसिस यह है कि किसी को इस क्राइसिस का पता ही नहीं है क्योंकि अपने ख़याल में सब कोई-न-कोई ख़्वाब देख रहे हैं.


                                               (राही मासूम रज़ा के 'टोपी शुक्ला' से साभार.)

सोमवार, 9 जनवरी 2012

मौसम

जब हम साथ होते हैं
कभी मौसम के बारे में नहीं पूछते 
क्या ही बेमानी सी चीज़  मालूम पड़ती है
कि कहें- 
देखो 
आज धूप खिली है 
वह उगती है 
और छा जाती है
हम पर
हवा चलती है 
और बहका जाती है
बारिश में घुलती मिट्टी की
महक
बहुत जानी-सी है
और
तुम्हारी बूंदों में पल-पल सोंधा हो जाना 
मैंने सीखा है
चुपचाप.


सुनो
तुम्हारे छत पर 
क्या आज भी हँसता है चाँद
जैसे 
कभी हमारे खुले सिरों  पर
खुल-खुल बरस पड़ता था 


और
मेरी अँजुरी
बन जाती थी हरसिंगार.

शुक्रवार, 9 दिसंबर 2011

...और मैं एंटरटेनमेंट हूं

सिल्क, एक ऐसी लड़की की कहानी है जो अस्सी की दशक में पैदा तो हुई लेकिन वह अपने समय से काफी आगे की सोच रखती है. व्यक्ति स्वातंत्रय की उस आदिम भावना को अपने जिस्म के लिफाफे में लपेटे वह लड़की अपने रास्ते खुद चुनती है और सोचती है कि वह अपनी मंजिल भी चुनेगी,ये उसका नितांत निजी चयन होगा. लेकिन पितृसत्तात्मक समाज के ढांचें में उसकी यह बोल्डनेस उसके खिलाफ एक ऐसा हथियार बन जाती है जिससे वह पूरी तरह निचोड़ ली जाती है, और जब तक उसे इस सच्चाई का अहसास होता है वह पूरी तरह टूट चुकी होती है. एक ऐसा समाज जहाँ औरत को देह से अधिक कुछ समझा नहीं जाता वहाँ  ऐसी स्त्री इस त्रासद अंत के लिए अभिशप्त है...द डर्टी पिक्चर वही रियल्टी बयां करती है.


हमने औरत को अपने सुविधा के अनुसार परिभाषित करने की आदत डाल ली है, औरत माँ है, बहन है, प्रेमिका है, बाजार में रखी मनोरंजन की वस्तु है...वह सब कुछ है, बस नहीं है तो औरत!  इन stereotype रूपों  में सिल्क की शख्सियत नहीं बंधती, उसे देखने के लिए जरूरी है कि हम अपने आंखों से रंगीन चश्मों को उतार फेंके.


'फिल्में तीन चीजों से चलती हैं- एंटरटेनमेंट,एंटरटेनमेंट,एंटरटेनमेंट और मैं एंटरटेनमेंट हूं'' कहने वाली औरत को इंडस्ट्री के मर्दों ने  यह कहकर खारिज  कर दिया कि उसके पास जो था वह दिखा चुकी. 

गुरुवार, 18 अगस्त 2011

झरोखा

मन है और उसको ओढ़े हुए एक देह
जीवन, धरती,फूल, शब्द 
और
विस्तृत मरुप्रांतर की शुष्क हवा
के ऊपर खिला है आकाश.


समुद्र है कहीं दूर उस न देखे झरोखे-सा
नदी की
छूटी हुई  धारा की पहुँच से बाहर
आँखों के काजल में डूबती दिशाएं
कुछ चिटक-सा जाता है हर बार.


आह ईश्वर! तुम हो
क्या यहीं कहीं बादलों में इन्द्रधनुष के रंगों-से
ओ मायावी!  


सोमवार, 8 अगस्त 2011

एक सवाल

एक प्रश्न मेरे ज़ेहन में बार-बार उठता है कि जातिवादी व्यवस्था जो हमारे समाज में एक अरसे से चली  आ रही  है,उसका समाधान क्या हो! आखिर वह कौन सी मानसिकता या कि सामाजिक समझ थी जिसने इस विचार को जन्म दिया होगा कि समाज खांचे में बटा हो.लेकिन इधर कुछ मित्रों की असहिष्णुता देखकर अहसास होता है कि किंचित ऐसे ही कुछ कट्टर मानसिकता के लोग होंगें जिन्होंने स्वयं को अन्यों से श्रेष्ठ मान लिया होगा.मैं बात कर रही हूँ आरक्षण के मुद्दे पर छिड़ी उस गर्म बहस की जिसमें पढ़े लिखे समझदार लोग भी नासमझों की भाषा इस्तेमाल कर रहे हैं और साम्प्रदायिकता के ज़हर का प्रसार कर रहे हैं. क्या आप को नहीं लगता कि इस तरह तो हम एक वर्णव्यवस्था से निकलकर दूसरी में प्रवेश करने की ओर अग्रसर हैं?