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सोमवार, 25 अक्टूबर 2010

सपना

चाँद को देखा मैंने
एक  अधूरा सपना
जिनके रेशे तार-तार होकर
निस्सीमता के आकाश में
बिखरते  जा रहे हैं.

 नदी की धार
सुनहरे गुलाबों की पंक्तियाँ 
निःशब्द धूप-छाहीं की आगोश में 
जैसे रीस रही थीं.