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मंगलवार, 19 मई 2026

 





'आधुनिक शेखर' 

                              - डॉ सुधा तिवारी 

  विद्रोही बनते नहीं, उत्पन्न होते हैं। विद्रोहबुद्धि परिस्थियों से संघर्ष की सामर्थ्य, जीवन की क्रियाओं से, परिस्थितियों के घात-प्रतिघात से नहीं निर्मित होती। वह आत्मा का कृत्रिम परिवेष्टन नहीं है, उसका अभिन्नतम अंग है। मैं नहीं मानता कि दैव कुछ है, क्योंकि हममें कोई विवशता, कोई बाध्यता है तो वह बाहरी नहीं, भीतरी है। यदि बाहरी होती, परकीय होती, तो हम उसे दैव कह सकते, पर वह तो भीतरी है, हमारी अपनी है, उसके पक्के होने के लिए भले ही बाहरी निमित्त हो।  उसे हम व्यक्तिगत नियति – Personal destiny - कह सकते हैं।”[i]

   शेखर : एक जीवनी उपन्यास की शुरुआत अज्ञेय मैं शैली में करते हैं परन्तु कथा के प्रवाह के साथ इस मैं’ का तृतीय पुरुष  में रूपांतरण होता जाता है. यह रूपांतरण एलियनेशन’ (alienation) की प्रक्रिया का हिस्सा है. इलियट’ के निर्वैयक्तिकता के सिद्धांत के अनुसार लेखक अपनी कृति से जितनी अधिक दूरी बना सकता है, कलात्मक दृष्टि से वह उतनी ही ऊँची कृति होगी. अज्ञेय’ और शेखर के बीच की दूरी सतत संघर्ष से अर्जित की गयी है. 'प्रवेश' में अज्ञेय इस सन्दर्भ में लिखते हैं – “कह डालूँ अन्तः कथा को; बहा डालूँ अन्तर्वेदना को ; बिखेर दूँ अन्तः ज्वाला को, लूटा दूँ आतंरिक अनुभूतियों को ; दान कर जाऊँ अपनी अन्तः शक्ति की चिर-संचित शिक्षाओं को, अपने अंतःकरण के उन्माद को!

  चला जाऊँ। थका हूँ, सो जाऊँ। पर, पहले इस एकमात्र अपने रहस्य को कह जाऊँ - जो नृवंश-विकास की मेरे नाम और मेरी नृवंश- विकास के नाम वसीयत है- अपनी विद्रोह-शक्ति की, अपने will to revolution की गाथा...”[ii]

अहं के इस विसर्जन, इस will to revolution की अभिव्यक्ति की कठोर इच्छाशक्ति से ही शेखर जैसे आधुनिक व्यक्तित्व का जन्म संभव है. आधुनिक चरित्रों की सृष्टि अज्ञेय के पहले भी हुई है परन्तु उनमें से कोई शेखर न बन सका. प्रेमचंद के उपन्यासों में भी आधुनिक प्रश्न उठाये गए हैं परन्तु वह मात्र विचार के स्तर तक ही सीमित रहा ; एक स्थूल, मांसल गठन नहीं हासिल कर सका. 'गोदान' उपन्यास में 'मेहता' और 'मालती' के चरित्र इसी श्रेणी के हैं,ये परम्परा के बोझ से स्वयं को मुक्त नहीं कर पाते. इस समस्या का मूल इन पात्रों के total attitude  में है, घटनाचक्रों के आरोह- अवरोह में बहते हुए जब चरम परिणति तक ये पहुँचते हैं उसी समय गच्चा खाकर परिस्थितियों से समझौता करना इनकी नियति है.

शेखर की आधुनिकता का रहस्य उसके जन्मना विद्रोही होने में है. एकदम शैशवावस्था की जो दो धुँधली स्मृतियाँ उसके मन में अंकित हैं उनमें से एक में लाल-लाल लेटरबॉक्स की सवारी से क्षुद्र संसार के क्षुद्र डाकिये के पैर पर कूदकर और दूसरी में चाकू से चमड़े के बाघ की खाल फाड़कर वह सीखता है कि, डर  डरने से होता है.[iii] उसका विद्रोह शिक्षा, परिवार, समाज सबके प्रति प्रकट होता है और वह रक्तसंबंधों पर व्यक्तिसंबंधों को प्राथमिकता देता है. वह अपनी माँ से घृणा करता है परन्तु सरस्वती से वह सीख सकता है. एक बीमार और दिन-प्रतिदिन मृत्यु की ओर बढ़ती शांति से वह मानवीय संबंध स्थापित कर सकता है, शशि की मौन स्वीकृति के प्रति आभारी हो सकता है. यानी वह व्यक्ति-केन्द्रित संबंधों की नींव डालता है और उन्हें पूरी शिद्दत के साथ जीता है. वह कुमार से संबंध बनाता है, फूलो के साथ खेलना चाहता है परन्तु कुमार की असलियत सामने आने पर उससे तत्काल संबंध-विच्छेद भी कर लेता है. कॉलेज के हॉस्टल में वह ब्राह्मण छात्रों की नाराजगी झेलता है, जो उसे विदेशी जंतु समझते हैं परन्तु हॉस्टल से निकालने में असमर्थ रहते हैं. जातिवाद का विकृत रूप वह मालाबार की रमणीय प्रकृति की गोद में देखता है. वहाँ उसे अछूतों की वास्तविक परिस्थिति का ज्ञान होता है, अर्धमृत नारी को कंधों पर उठाकर मिशन भवन तक ले जाता है जहां उसे जलाने का प्रबंध किया जाता है। वह ब्राह्मण हॉस्टल छोड़कर अछूतों  के हॉस्टल में चला जाता है और समाज सुधार के लिए कार्य करता है. वह अछूत बच्चों को पढ़ाता है,ट्रेन में हुए कटु अनुभव के बाद पितृसत्तात्मक समाज में स्त्रियों की दोयम दर्जे की उपस्थिति के खिलाफ चेतना जगाने का कार्य करता है. अपने तीन दोस्तों के साथ वह 'एंटीगोनम क्लब' की स्थापना करता है जिसके प्रतीक चिह्न सफेद फूल को देखकर कॉलेज के छात्र उसपर हंसते हैं, छींटाकशी करते हैं.यह सब जानते हुए भी उसका उत्साह कम नहीं होता क्योंकि mob का हिस्सा बनना उसके विद्रोही व्यक्तित्व को कतई मंजूर नहीं है; उसकी मुख्य लड़ाई ही इस शीलित जड़ता के विरुद्ध है जो उसे निरंतर सजग सायास रखती है, अचेतन में भी. वह जनता है कि ‘सत्य उनके लिए है जिनमें उसे सह लेने की शक्ति है’; रोमाँ रोलाँ की इन पंक्तियों को पढ़कर उसने पाया कि वह समुद्र पार कर आया है, कि वह सम्पूर्ण है, मुक्त है, और पुरुष है.[iv]

ये सारी घटनाएँ और उससे भी महत्वपूर्ण ‘शशि’ के साथ अर्जित किया गया ‘सखी भाव’ किसी एक और भी अधिक गहरी बात की तरफ इंगित करते हैं – ‘शेखर’ एक अपना निजी स्पेस बना रहा है, एक अभिन्नतम निजता (privacy) वह अर्जित करता है जो इस भरे-पूरे समाज-परिवार के बीच उसे अनछुआ रख सकता है, स्वप्न में देखे गए पहाड़ी झरने के मध्य प्रवाह में पतले नाल पर खिले सफेद लिपटी हुई पत्तियों वाले एकाकी फूल की तरह, जिसके बीचोंबीच तपे सोने-से वर्ण की एक डंडी है. शायद यही कारण है कि शेखर को एक व्यक्तिवादी उपन्यास कहा जाता है, यहाँ प्रश्न यह है कि यह व्यक्ति कौन है और क्या है. यह व्यक्ति इतना बड़ा है कि व्यक्तिवाद और समष्टि के बीच जो अकारण विरोध मानकर वाक्-युद्ध लड़े जाते हैं उनकी निरस्तता सिद्ध करता है.[v] यहाँ मुख्य प्रश्न यह नहीं है कि शेखर व्यक्तिवादी उपन्यास है या नहीं, हमारी प्राथमिकता उसके कलात्मक मर्म को छूने की है. रोलां बार्थ के शब्दों में किसी भी साहित्य की महानता इस तथ्य से आंकी जानी चाहिए कि क्या उसमें जीवन की धडकनें व्यंजित होती हैं? क्या साहित्य से जीवन को प्राणवायु मिलती है? क्या जीवन को साहित्य विकसित करता है या उसका विध्वंस करता है?”[vi]

“कम से कम अज्ञेय के साहित्य के सन्दर्भ में हम यह कह सकते हैं कि साहित्य में जीवन संचार के साथ-साथ जीवन में भी सर्जनात्मक प्राणवायु के संचार में उनके साहित्य का महत्वपूर्ण योगदान है. खासकर उनके क्रांतिकारी जीवन की रचनाओं, भारत-विभाजन की पृष्ठभूमि पर लिखी रचनाओं, अलगाव-केन्द्रित कथा साहित्य और आपातकाल के विरोध में लिखी रचनाओं ने हिंदी साहित्य की जनवादी परम्परा को समृद्ध किया है.”[vii] वास्तविकता यह है कि अज्ञेय ‘मौन’ को अभिव्यंजना मानने वाले कृतिकार हैं. “अज्ञेय के संदर्भ में यह 'मौन' मितकथन है, कहने और न कहने के बीच अनकहना है, तथा और गहरे स्तर पर आत्मदान का भाव है, जहाँ बोलना मानो आक्रमण है, मौन ही अपने को देना है. समकालीन समीक्षा की यह एक और विडंबना है कि आत्मदान के लिए प्रतिश्रुत कवि अज्ञेय को अभी तक ‘व्यक्तिवादी’ कहा जाता रहा है. समीक्षा के इस रूप में 'व्यक्ति' और 'व्यक्तित्व' के बीच भी विवेक नहीं किया गया है. पर अज्ञेय के कृतित्व का वैशिष्ट्य व्यक्तित्व और भाषा के गहरे आयामों को अभिव्यक्ति देने में रहा है, कविता और कथा साहित्य दोनों में ही.”[viii]

‘शेखर :एक जीवनी’ के प्रकाशन से लेकर आज तक इसके बारे में बहुत कुछ लिखा गया है – पक्ष में भी और विपक्ष में भी. परन्तु एक तथ्य निर्विवाद है कि ‘शेखर’ हिंदी उपन्यास जगत में अपनी टेकनीक और गठन के लिहाज से अनोखा है, एक क्रांति है.शायद यही कारण है कि अज्ञेय की समानता दुनिया भर के लेखकों से खोजने की कोशिश की गयी, खासकर अंग्रेज़ी साहित्यकारों से. जहाँ तक प्रभाव की बात है, अज्ञेय के उपन्यास-टेकनीक में मार्सल प्रूस्त, जेम्स ज्वॉयस, रोमां रोलां, वर्जीनिया वूल्फ जैसे आधुनिक उपन्यासकारों की झलक दिखायी देती है. उन्होंने फ्रायड के मनोविज्ञान का अध्ययन किया था और अपने उपन्यासों में मनोविज्ञान की भूमिका पर चरित्रों की सृष्टि करने वाले वे हिंदी के प्रथम उपन्यासकार हैं. इस सन्दर्भ में भोलाभाई पटेल का कथन द्रष्टव्य है – “शेखर की आत्मकथनात्मकता ही मनोवैज्ञानिक यथार्थ के निरूपण में सिद्धिदा है. अज्ञेय जब शेखर का निर्माण कर रहे हैं, तो एक तरह से उनकी अपनी तस्वीर का अंकन करते हैं, जो तस्वीर एक युवा कलाकार की है, प्रणयी की है, क्रांतिकारी की है. इस तस्वीर का आलेखन करते समय उनके सामने संगीतकार ज्याँ कक्रिस्तोफ की तस्वीर है, युवा कलाकार स्टीफन की तस्वीर है, या मार्सेल की तस्वीर है. इतना ही नहीं तस्वीर के अंकन की प्रक्रिया भी है. ‘शेखर’ के समग्र निर्माण में इनका योग रहा है.”[ix]

अज्ञेय ने बनारसीदास चतुर्वेदी द्वारा उठाये गए प्रश्न के उत्तर में शेखर पर रोलां का प्रभाव स्वीकार किया है –“शेखर के निर्माण के समय क्या किसी विदेशी उपन्यास का कोई पात्र आपके सामने था? सामने था, यह कहना गलत होगा. पर परोक्ष भी नहीं था यह दावा मैं कैसे कर सकता हूँ...‘ज्यों क्रिस्तोफ’ के अनवरत आत्मशोध और आत्म-साक्षात्कार का जो चित्र रोलाँ ने प्रस्तुत किया है, उससे मुझे अवश्य प्रेरणा मिली लेकिन न तो ‘शेखर’ उपन्यास ‘ज्यों क्रिस्तोफ’ जैसा उपन्यास है,न शेखर वैसा पात्र है. समानता इतनी ही है कि जैसे क्रिस्तोफ में लेखक एक आत्मान्वेषी के पीछे उसका चित्र खींचता चला है वैसे ही मैं एक दूसरे आत्मान्वेषी के पीछे चला हूँ.”[x] कलाकार का मानस परंपरा की मृत्तिका से तैयार होता है और इस तरह वह अनायास ही उससे आगे की रचना है. भोलाभाई पटेल अपने अध्ययन में इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि – “शेखर अज्ञेय का ‘शेखर’ है.प्रभाव मूलतः लेखक की चेतना पर होता है, और संवेदनाओं को रूपायित करने में वह नए कला-योग का रूप ले लेती है. शेखर के निर्माण में इन सबका योग इस रूप में अवश्य हो सकता है.इसके अतिरिक्त शेखर के निर्माण के लिए लेखक को इन चरित्रों की जरुरत नहीं थी,क्योंकि,जैसा कि स्वयं ‘अज्ञेय’ ने कहा है, ‘मुझे प्रत्यक्ष अनुभव था’. शेखर अवश्य इन चरित्रों का सगोत्र है. ये सभी पाश्चात्य उपन्यास कलाकार-उपन्यास ‘क्युन्स्टलर-रोमान’ और गठन उपन्यास ‘बिल्डुंग्स रोमान’ हैं, और ‘शेखर’ भी इसी श्रेणी का हिंदी का सर्वप्रथम उपन्यास है”[xi]

इन सारे प्रभावों-प्रेरणाओं से भी कहीं अधिक गहरे स्तर पर अज्ञेय पर उस भारतीय साहित्यिक परम्परा की विराट भावभूमि का असर है,जिसकी वह उपज हैं और सही मायनों में वारिस भी. विजयदेव नारायण साही अज्ञेय की निकटता जयशंकर प्रसाद के साथ देखते हैं. उन दोनों को एक ही सिमिट्री की दो विपरीत दिशाएं मानते हैं, जिसके ‘बेस’ में तीसरे दशक की खण्डित चेतना वाली मनोभूमि है. “तीसरा दशक सत्य क्या है, यह तो पूछता है, परन्तु उत्तर की प्रतीक्षा नहीं करता. तारसप्तक के कवि सत्य क्या है, पूछते हैं और अत्यंत आतुरता से प्रतीक्षा करते हैं. उत्तर की यह आतुर प्रतीक्षा ही उन्हें मंजिल पर पहुँचे हुए राही नहीं, ‘राहों का अन्वेषी’ बनाती है. संक्षेप में यह कि उन्होंने क्राइसिस का सामना किया.”[xii] बच्चन और प्रसाद की घुली हुई संवेदनाओं का प्रतिफलन है ‘शेखर’ जिसका रूप-गठन अज्ञेय के अति आधुनिक मानस में हुआ है. ‘कामायनी’ का हहराता हुआ महासमुद्र ‘शेखर’ के समूचे अस्तित्व में जज़्ब है. वह ‘राहों का अन्वेषी’ है, बाल्यावस्था की सौंदर्य के प्रति उसकी जिज्ञासा से आरम्भ होनेवाली अन्वेषण कीई प्रक्रिया उसे आजीवन एक अनथक यात्रा की ओर भगाए लिए चली जाती है. उसकी जिज्ञासा कुछ उस आदिम मनुष्य की तड़प-सी है जिसमें उसने इश्वर से सृष्टि का रहस्य जानना चाहा था –

  “ईश्वर ने कोई उत्तर नहीं दिया। तब मानव ने साँप से पूछा,‘ओ ज्ञान के रक्षक साँप,बताओ यह क्या है जिसने मुझे तुम्हारा और ईश्वर का समकक्ष बना दिया है – एक स्रष्टा – बताओ,मैं जानना चाहता हूँ!’

  साँप ने कहा, ‘मैं हार गया। ईश्वर ने ज्ञान मुझसे छीन लिया।’ और उसकी गुंजलक धीरे-धीरे खुल गई।

  ईश्वर ने कहा – ‘मेरी सृष्टि सफल हुई,लेकिन विजय मानव की है। मैं ज्ञानमय हूँ,पूर्ण हूँ। मैं खोजता नहीं। मानव में जिज्ञासा है, अतः वह विश्व को चलाता है, गति देता है...’ [xiii]

अज्ञेय ने अपने लेखन को स्टीरियोटाइप रूपों से मुक्त रखा है. कथ्य की प्रतिबद्ध सजगता वस्तुशिल्प को तराशती चलती है. Percy lubbock का कथा-शिल्प के बारे में कथन है – “the whole intricate question of method, in the craft of fiction,I take to be governed by the question of the – point of view- the question of the relation in which the narrator stands to story.” अज्ञेय अपने उपन्यासों में सर्वज्ञ कथाकार कहीं नहीं हैं और इसका कारण उनकी विशिष्ट रचना-दृष्टि है. ‘नया प्रतीक’ में इसका विश्लेषण उन्होंने बड़े सुन्दर ढंग से किया है - “‘मैं’ और ‘वह’ के उपन्यासों की सहज सीमाएँ हो जाती हैं। कथावस्तु से –घटना से,देशकाल से और हाँ पाठक से- दूरी का प्रश्न उसका पहलू है। कहने को यह तकनीकी प्रश्न है पर संरचना की भित्ति तकनीक पर ही होती है। फिर ‘मैं’ की जानकारी की सीमा होती है: बल्कि कहानी के एक पात्र का दृष्टिकोण अपना लेने पर (फिर उस पात्र को चाहे ‘वह’के रूप में प्रस्तुत किया जाए) भी जानकारी की ही नहीं दृष्टि की पूर्वग्रहों और रागबंधोंकी घटना के संघटन की सीमाएँ सामने आ जाती हैं।...उपन्यासकार सर्वज्ञ भी हो सकता है; उस दृष्टिकोण से आरम्भ करने पर बहुत सी सुविधाएँ उपन्यासकार को प्राप्त हो जाती हैं,पर उसकी अपनी तर्कसंगति होती है – वह ‘दूरी’ और ‘दृष्टि’ और घटना-संघटन की अपनी बाध्यताएँ साथ लाता है।”[xiv]

शेखर दो भागों में प्रकाशित उपन्यास है,इसके तीसरे भाग की परिकल्पना भी की गयी थी परन्तु वह प्रकाशित न हो सकी. बहरहाल उपन्यास के प्रथम भाग ‘उत्थान’ का आरंभ ‘प्रवेश’ से होता है. “प्रवेश खण्ड जैसे किसी विशाल भवन का प्रवेश-द्वार है,जहाँ आसन्नमृत्यु शेखर से हमारी भेंट होती है और जैसे उसकी ही उँगली पकड़कर इस भवन के विभिन्न कक्षों में हम प्रवेश करते हैं.(इस तरह से इस उपन्यास की वस्तुसंरचना टोमस हार्डी के उपन्यास की सुगठित वस्तुसंरचना की याद दिलाती है) ‘शेखर’ के साथ ‘शिल्पप्रधान’ उपन्यासों के युग में हम पदार्पण करते हैं.”[xv]

अपने क्रांतिकारी जीवन का प्रत्यावलोकन करते समय ‘शेखर’ के मन में सबसे पहले ‘शशि’ की स्मृति आती है – “सबसे पहले तुम, शशि।

  इसलिए नहीं कि तुम जीवन में सबसे पहले आयीं या कि तुम सबसे ताज़ी स्मृति हो। इसलिए कि मेरा होना अनिवार्य रूप से तुम्हारे होने को लेकर है – ठीक वैसे ही जैसे तलवार में धार का होना सान की पूर्वकल्पना करता है। तुम वह सान रही हो,जिस पर मेरा जीवन बराबर चढ़ाया जाकर तेज होता रहा है- जिस पर मँज-मँज कर मैं कुछ बना हूँ जो संसार के आगे खड़ा होने में लज्जित नहीं है – लज्जित होने का कोई कारण नहीं जानता।”[xvi]

और उसकी अंतिम विदा के साथ ‘जीवनी’(दूसरे भाग) की समाप्ति होती है।शेखर को लगता है जैसे- “जीवन ने अर्थ खो दिया है, यथार्थता, व्यवस्था, गति सब-कुछ खो दिया है। निरा अस्तित्व – एक क्षण से दूसरे क्षण तक एक अणु-पुंज का बने रहना – वह भी मिट गया है।”[xvii]इस तरह समय का एक पूरा चक्र घूम जाता है और ‘शेखर’ एक नयी यात्रा की ओर चल पड़ता है; जहाँ अगर संभावना नहीं है तो कोई त्रास भी नहीं है –

 “छाया, तुम्हें भूलने नहीं जाता, तुम साथ चलो –पहले मौसी के पास और गौरा के पास, फिर -आगे; कर्म में विस्मरण नहीं है, शशि कर्म में तुम हो, चिरंतन प्रेरणा –चिरंतन क्योंकि मुक्त और –मोक्षदा...”[xviii]

 



संदर्भ ग्रंथ-सूची: 

[i] अज्ञेय सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन, प्रवेश, शेखर एक जीवनी -पहला भाग : उत्थान, संस्करण-२००५,नोएड़ा, पृ.१५

[ii] अज्ञेय सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन, प्रवेश, शेखर एक जीवनी –पहला भाग : उत्थान, संस्करण-२००५,नोएड़ा, पृ.२५

[iii] अज्ञेय सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन, उषा और इश्वर, शेखर एक जीवनी –पहला भाग, संस्करण-२००५, नोएड़ा, पृ.३९

[iv] अज्ञेय सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन, पुरुष और परिस्थिति, शेखर एक जीवनी –पहला भाग, संस्करण-२००५, नोएड़ा, पृ.१७७.

[v] बांदिवडेकर चंद्रकांत म., शेखर –एक जीवनी :समग्र अनुशीलन, कथाकार अज्ञेय,प्रथम संस्करण, चंडीगढ़ १९९३,पृ.११.

[vi] बार्थ रोलां, ‘जनवादी अज्ञेय की तलाश में’ उद्धृत, जगदीश्वर चतुर्वेदी.ब्लॉगस्पॉट.कॉम

[vii] चतुर्वेदी जगदीश्वर, जनवादी अज्ञेय की तलाश में, जगदीश्वर चतुर्वेदी.ब्लॉगस्पॉट.कॉम.

[viii] चतुर्वेदी डॉ. रामस्वरूप, समकालीन हिन्दी साहित्य: विविध परिदृश्य, द्वितीय संस्कर, नयी दिल्ली २०००, पृ.१९५-१९६.

[ix] पटेल भोलाभाई, अज्ञेय: एक अध्ययन, द्वितीय संस्करण, नयी दिल्ली, २००२, पृ.१५४.

[x] अज्ञेय सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन, आत्मनेपद, पृ.६४.

[xi] पटेल भोलाभाई, अज्ञेय:एक अध्ययन,द्वितीय संस्करण,नयी दिल्ली २००२, पृ.१७८.

[xii] साही विजयदेव नारायण, लघुमानव के बहाने हिन्दी कविता पर एक बहस, नयी कविता:सैद्धांतिक पक्ष(खण्ड-एक), संपादक-   जगदीश गुप्त-रामस्वरूप चतुर्वेदी-विजयदेव नारायण साही, प्रथम संस्करण,इलाहाबाद २०००, पृ.२२६

[xiii] अज्ञेय सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन, शेखर:एक जीवनी-दूसरा भाग, संस्करण-२००५, नोएड़ा, पृ.८४.

[xiv] अज्ञेय सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन, नया प्रतीक, जुलाई १९४७, पृ.६२.

[xv] पटेल भोलाभाई, अज्ञेय:एक अध्ययन, उपन्यासकार अज्ञेय, द्वितीय संस्करण, नयी दिल्ली,२००२, पृ.१३६

[xvi] अज्ञेय सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन, प्रवेश, शेखर:एक जीवनी-पहला भाग; उत्थान, संस्करण-२००५, नोएड़ा, पृ.४.

[xvii] अज्ञेय सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन, पुरुष और परिस्थिति, शेखर:एक जीवनी, दूसरा भाग, संस्करण-२००५, नोएड़ा, पृ.२५.

[xviii] अज्ञेय सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन, शेखर:एक जीवनी,दूसरा भाग, संस्करण-२००५,नोएड़ा, पृ.२५२.


(चित्र : इंटरनेट से साभार )


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